जुल्म ए जालिम

बहुत खुश हूं तेरे आगोश में ए जालिम, तेरा ये जुल्म इतना लुभाता क्यूं है 
हिम्मत है तो उतार खंजर सीने में, ये धीरे धीरे चुबाता क्यूं है

रोक देता है सांसे तेरा बार बार भड़कना, फिर तू हर बार मुस्कुराता क्यूं है
लगाई है आग तो जलने दे घर सबके, तू बार बार बरसात कराता क्यूं है

उठ गया हूं फिर से सोने के लिए, तू बार बार मीठी लोरी सुनाता क्यूं है
गर इतना ही तंग है मेरी मौजूदगी से तू, फिर सपने में भी बार बार मिलने आता क्यूं है

नहीं मिलना तो ना मिल, हम भी भूले तुझे, ये मेरा ही सामान बार बार तेरी याद दिलाता क्यूं है
हकीकत से ख्वाईश बना है तू, “टुटता है हर सपना” कह कर बार बार डराता क्यूं है
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किसके लिए?

जानता था गलती कर रहा हूं
ना करता तो ना करता किसके लिए?
कुछ तो मकसद तेरे आने का भी होगा
हमे तो बताओ आए थे जिसके लिए

वो ना आए खिड़की पर एक बार भी
थकती रही साइकिल हमारी जिसके लिए
ढूंढ लेते थे उत्तर का रास्ता दक्षिण से भी
उड़ाते रहे कागच के रॉकेट जिसके लिए

लानत दे रहा था वो जाते जाते
अब न देता तो बचाता बताओ किसके लिए
इबादत करना अब उसे मंजूर नहीं
वो करे तो क्यों करे और करे किसके लिए
छोड़ दी शराब हमने पीनी अब
गम डुबाते तो क्यूं डुबाते और बताओ किसके लिए

कुछ कुछ अधूरा

प्यार तुमने भी किया मैंने भी लिया
इज़हार तुमने भी किया मैंने भी किया
दुनिया को बताने की हिम्मत न मैंने की न तुमने की
अधूरा रहने का फ़ैसला मैंने भी किया तुमने भी किया

कुछ कुछ अधूरा रह जाए तो अच्छा है
सबकुछ न कह पाये तो अच्छा है
कम दिखते है हंजू जब मैं चलता हूं
सबको सबकुछ न दिख पाए तो अच्छा है

दूरियां गजब लगती है मुझे
जुदाई कम लगती है मुझे
सोचता हूं एक इश्क और कर लूं
उदासी बड़ी हसीन लगती है मुझे

दूरियां

मैं भी रोया था उनसे मिलकर बहुत
वो मिल रहे थे बिछड़ने के लिऐ
न ढूंढने की कसम देकर
वो जा रहे थे जिंदगी भर के लिऐ
वो खत भी जलवा गए थे जाते जाते
जिसमे वादे किए थे उम्र भर के लिऐ

वो तेरा, वो मेरा, वो हमारा अब सब किसका है?
वो सब संजोया था किसके लिए
वक्त की आग ही ठंडक दे सके तो दे
फूंक गया मुसाफिर चलते चलते
आशियाना सजाया था जिसके लिए

Few Lines on my Dentist

चार दांतो पर चौंतीस चक्कर मैंने अब तक लगाए
फोर्सेप एक्सप्लोरर लेकर वो दांतो मे घुस जाए
सच में मिलने आता रहूंगा दांत चाहे ठीक हो जाए
हे देवी, थोड़ी सी कृपा करदो हम भी खाना चबा पाएं

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उसने चेहरा दूर से देखा तो उसे प्यार हो गया
तुम अंदर झांकती हो तुम्हारा क्या होगा


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मेरे दर्द को मुस्कुरा कर दूर कर सकते थे वो
मगर दांत को उखाड़ना उन्हें आसान लगा
मैं समझता था उन्हे मेरे दर्द से हमदर्दी है
उन्हे तो नोटों के आने का आगाज लगा


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वो एनेस्थीसिया जो दिया था तुमने दांतो मे
अब दिल में उतर गया है
तुम्हे देखता हूं तो सुन्न सा लगता है
ये प्यार नहीं तो क्या है


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ऐसी भी क्या जिद्द मिलने की
दर्द दिया और बुला लिया
एक मिटाया दो और दिए
तुम्ही बताओ दवा दी या मर्ज दिया


चलो चलता हूं, आता रहूंगा
चार निकले अठाईस बचे, उन्हे भी आपसे निकलवाता रहूंगा
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आज कल

तुमको तो पता है राते कैसे गुजर रही है आज कल
खुली आंखों में नींद बसर रही है आज कल


जानते हो तो बोलते क्यूं नहीं
अब और किससे झूठी तारीफ सुन रहे हो आज कल


देखना सुनना मुस्कुराना सब बीत गया
किसके फरेब में फस रहे हो आज कल


पास से निकल गए नजर चुरा कर
लगता है किसी नए से मिल रहे हो आज कल

इंतजार

सही वक्त के इंतजार में उम्र गुजार दी
लोगो ने बुरे वक्त में भी त्योहार सजा लिय


तुम ख्वाहिश करते रहे सच होने की
हमने झूठ को ही सच का फरमान मान लिया


नींद आंखों मे रही, ज़हन में न पहुंची
हमने करवट को ही नींद का एहसान मान लिया


खरखराहट सूखे पत्तों के हिलने की हुई
खामोशी को उनके आने का पैगाम मान लिया


हम तुम्हारे शांत होने का इंतजार करते रहे
तुमने शराफत को हीज्र ए निशां मान लिया

करवाचौथ

ए चांद निकल आना आज सुबह सुबह ही
क्यों इतने चांदो को है प्यासा रखता
क्यों डर नहीं तुझे इन प्यासी आहो का
निकल जल्दी तुझे चांदनी का वास्ता

पानी की बूंद भी आज कमाल करती है
वो पी ले तो हम निकले, ना पिए तो उम्रदराज करती है

तेरा वादा जान बचाने का सच्चा नही रहा
कितने वर्त रखती थी शहीद की बेवा भी
रखवाला जो सरहद का अब दुनिया में नहीं रहा

अगर तु उम्रदराजी की गारंटी दे पाए
रखेगा वर्त सारा देश, अब और शहीदी न जाए

गिला शिकवा शायरी

तुम्हे शिकवा मेरी मौजूदगी से है
ये लो हम गुमशुदा हो गए
मुस्कुराओ तुम अकेले हो अब
ऐसे क्यों गमज़दा हो गए

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कैसी तबियत है गुलिस्तां के फूल की, कांटे पत्तियां झाड़ कर जो मुस्कराना चाहता था
मिट्टी से दूर होकर साफ रहने की हवस, अकेला ही टहनी पर खिलखिलाना चाहता था
माली ने तोड़ कर रौंदा उसे बहुत, बगीचे को अवसाद की बिमारी बनाना चाहता था

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गजल तुम पर

ये जो पूरा का पूरा अधूरा छोड़ रहे हो
अनबने रिश्ते तोड रहे हो
नफरत घोसलो के तिनकों से है गर
तो सिर्फ तिनका निकालो, घोसला क्यों तोड रहे हो

जो मिला ही नहीं वो छोड़ दिया
अंगूर खट्टे है आखिर बोल ही दिया
हर बात में नुक्स देखने का हुनर
क्या तुमने भी आइना तोड़ दिया

खामोशी से देखता हूं तुमको आते जाते
हर बार कुछ नया ले ही जाते हो
तुमको लगता है गुजरते हो सड़क से
क्या बताएं ख्यालों में कितने चक्कर लगाते हो
धीमे कदम पास निकलते तेज लगते है
थम जाया करो जब यहां से जाते हो
वक्त के रुकने का अहसास हर बार होता है
जब जब तुम हल्के से नजरे मिलाते हो
अब समझा ला इलाहा को लैला वो क्यों कहता था
तुम भी सूरत ए खुदा से मेल जो खाते हो
धड़कने सांसे आंखे अहसास खामोशी हवा मिट्टी शब्द और कायनात
सब शून्य लगता है जब नजरो में गहरा जाते हो